Saturday, September 24, 2011

कश्ती

 
हमारे तो अरमान कागज़ की कश्ती में बहते  हैं|
थोड़ी सी बारिश हुई नहीं कि
उत्तरपुस्तिका के कोरे पन्नों से
हम अरमानों की कश्ती बनाकर
गली की पतली धारा में बहा देते हैं|
फिर उन अरमानों को बारिश निगले
या पड़ोस का गप्पू हथिया ले,
परवाह नहीं|
हमने तो बस अरमानों की कश्ती छोड़ दी,
अब वो किस मंजिल पे
किस धारा से होकर जायेगी,
परवाह नहीं|  

3 comments:

surbhimh said...

क्या हो गयी इन अरमानों से कोई खता
कि बिन परवाह बहा देते हो इन्हें
या है मुक़द्दर पर इतना यकीं
कि परवाह करने की जरुरत ही नहीं!

Apoorva Chandra said...

सुन्दर शब्दों के लिए शुक्रिया :)

जब अरमानों ने कोरे कागज़ पे स्वरूप लिया,
कश्ती के सहारे सागर से मिलने की प्रेरणा ली,
हम यह पूछना भूल ही गए कि फिर मुलाकात कब होगी|

परवाह भी है, भरोसा भी, जब भी उनकी खबर मिलेगी, ख़ुशी होगी इस बात की कि हमने एक अरमान देखा|

Apoorva Chandra said...

"क्या हो गयी इन अरमानों से कोई खता
कि बिन परवाह बहा देते हो इन्हें
या है मुक़द्दर पर इतना यकीं
कि परवाह करने की जरुरत ही नहीं!"

ये पंक्तियाँ 'कश्ती' की पंक्तियों को बहुत अच्छी तरह समझती हैं|